जज़्बा – आत्मविश्वास,हिम्मत और स्त्रीत्व की.. भाग – १

जज़्बा – आत्मविश्वास,हिम्मत और स्त्रीत्व की.. भाग – १

नमस्कार मैं नूपुर एक बार फिर आप लोगों के साथ अपने विचार साझा करने आयी हूँ। आज विश्व दिव्यांग दिवस के मौके पर मैं आप लोगों के लिए एक विशेष लेख लेकर आयी हूँ। इस लेख में ४ ऐसी स्त्रियों की कहानियां है जिन्होंने अपने आत्मविश्वास,हिम्मत और स्त्रीत्व से लोगो के अंदर एक नए ज़ज़्बे को जन्म दिया। इन महिलाओं ने साबित किया किएक महिला अगर थान तोह मुश्किल कुछ भी नहीं है इन्होने साबित किया कि दिव्यांग होना श्राप नहीं है इन्हे देखकर लोगों ने समझा कि औरों से अलग होना गलत होना कतई नहीं है इन्होने लोगों को जीवन का मतलब समझाया। चलिए शुरू करते है सफर जज़्बा – आत्मविश्वास,हिम्मत और स्त्रीत्व की सच्ची कहानियाँ का और मिलते है मेरी पहली सच्ची कहानी और उसकी नायिका से :


किरण कनौजिया- इन्हे हम सब आज भारत की पहली महिला महिला ब्लेड रनर के रूप में पहचानते हैं। ये जन्म से दिव्यांग नहीं थी बल्कि एक हादसे के कारण दिव्यांग हो गयी थी। इनका जन्म हरियाणा राज्य के फरीदाबाद में हुआ था। इनके परिवार को अनेक आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता था। इनके माता -पिता कपड़ो को प्रेस करने का काम करके पुरे महीने में २००० रुपये कमा पाते थे। किरण ३ भाई बहन है उनके माता-पिता को घर और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करना पड़ता था।कभी कभी तो उनके पास बिजली का बिल भरने के पैसे भी नहीं होते थे जिस वजह से किरण और उनके भाई बहनो को सड़क पर लगी लाइट के नीचे बैठकर पढाई करते थे।


विपरीत और कठिन परिस्थितियों में भी कभी हार नहीं मानी और निरंतर मेहनत करती हुई आगे बढ़ी 12वीं तक उन्होंने पढाई में खूब मेहनत की, जिसके कारण उन्हें एक अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला मिला। फर्स्ट इयर में क्लास में जब उन्होंने टॉप किया, तो बाकी कोर्स के लिए उन्हें स्कॉलरशिप मिल गई। इतना ही नहीं, पढ़ाई के बाद उन्हें उनकी ड्रीम कंपनी में नौकरी भी मिल गई। उनकी नौकरी के बाद सबकुछ ठीक होने लगा था। घर के हालात सुधरने लगे थे।किरण का 25वां जन्मदिन था। रोज की तरह वो रात की ट्रेन लेकर ऑफिस से घर लौट रही थीं। वो गेट के पास खड़ी थी। तभी दो आदमी आए और किरण का बैग छीनने लगे। जब वो किरण से उनका बैग नहीं छीन पाए तो दोनों चलती ट्रेन से कूद गए और उन्हें भी साथ खींच लिया। वे भाग गए। लेकिन किरण का पैर ट्रैक्स में फंस गया, जिस पर से ट्रेन के चार कोच गुजर गए। लोग उन्हें हॉस्पिटल ले गए। जहां डॉक्टर्स ने उन्हें बताया कि उनका पैर ठीक नहीं किया जा सकता। उसे काटना पड़ेगा।ये सुनकर किरण और उनका परिवार पूरी तरह से टूट गया एक महीने तक बिस्तर पर रहने के बाद उन्हें प्रोस्थेटिक लेग (कृत्रिम पैर) लगाया गया। उन्हें एक नई उम्मीद मिली।लेकिन रूटीन चेकअप के दौरान जब किरण ने डॉक्टर से दर्द रहने की बात कही, तो डॉक्टर ने कहा कि कुछ स्टेपल्स पैर में रह गए है जिसके कारन वो चल तो सकेगी लेकिन दौड़ नहीं पाएगी इसके बाद किरण ने फिर से नौकरी शुरू की और ‘नए सिरे से जिंदगी जीने के तरीके ढूंढने लगी। उन्हें जिंदगी में बहुत कुछ करना था। इसलिए वो पुनर्वास केंद्र गई, जो पैरा-एथलीट्स को ट्रेनिंग देता था। उन्होंने तय किया कि उन्हें सिर्फ चलना नहीं है… वो दौड़ना चाहती थीं और सबको गलत साबित करना चाहती थीं।इसके बाद किरण ने ट्रेनिंग शुरू की और खूब मेहनत की। कुछ ही महीनों में वो दौड़ने लगीं! उन्होंने एक मैराथन में भाग लिया और 21 किलोमीटर तक दौड़ीं। अब वह लगातार मैराथन दौड़ती हैं और भारत की पहली महिला ब्लेड रनर बन गई हैं I

Written by: Noopur Chauhan, Kanpur, Jr. Editor, Ability India

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