जज़्बा – आत्मविश्वास,हिम्मत और स्त्रीत्व की.. भाग – ३

जज़्बा – आत्मविश्वास,हिम्मत और स्त्रीत्व की.. भाग – ३

अवनि लेखरा -इन्होने टोक्यो पैरालंपिक 2021 में महिलाओं के 10 मीटर एयर राइफल के क्लास एसएच1 के फाइनल में इतिहास रचते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया था. बता दे कि इससे पहले अवनी लेखरा दुबई में आयोजित पैरा शूटिंग विश्व कप के 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में रजत पदक भी अपने नाम कर चुकी है। भारत के पैरा निशानेबाज मूल रुप से राजस्थान के जयपुर की रहने वाली है. अवनी लेखरा के पिता का नाम प्रवीण लेखरा है. अवनी लेखरा की माता का नाम श्वेता लेखरा है. साल 2012 में अवनी लेखरा अपने पिता प्रवीण लेखरा के साथ जयपुर से धौलपुर जा रही थी. इसी दौरान रास्ते में वह सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए. इस हादसे में अवनी लेखरा और प्रवीण लेखरा दोनों घायल हो गए. प्रवीण लेखरा तो जल्द ही ठीक हो गए, लेकिन अवनी लेखरा की रीड की हड्डी टूट गई और वह जिंदगी भर चलने में असमर्थ हो गई.जिंदगी भर के लिए दिव्यांग होने के बाद अवनी लेखरा काफी निराश हो गई थी. उन्होंने अपने आप को एक कमरे में बंद कर लिया था. इस बीच एक दिन उन्होंने अभिनव बिन्द्रा की बायोग्राफी पढ़ी. इससे उन्हें काफी प्रेरणा मिली. इसके बाद अवनी लेखरा ने अपने घर के पास ही स्थित शूटिंग रेंज पर जाकर अभ्यास करना शुरू किया. इसमें अवनी लेखरा का परिवार और उनके कोच ने उनका भरपूर साथ दिया. अपने कोच के निर्देशन में अवनी लेखरा जल्द ही एक बेहतरीन पैरा निशानेबाज बन गई.
आइये अब मिलते हैं मेरी चौथी और आखिरी सच्ची कहानी और उसकी नायिका से जिनकी हिम्मत हर लड़की को प्रेरित करती है
४ दीपा मलिक- दीपा मलिक एक भारतीय तैराक, बाइकर और एथलीट है. दीपा का कमर से नीचे का अंग लकवा ग्रसित है, इसके बाबजूद उन्होंने विभिन्न साहसिक खेलों में भागीदारी की और अनेकों पुरुस्कार जीते. दीपा पहली भारतीय महिला है, जिन्होंने पैरालिम्पिक गेम्स में सिल्वर मैडल जीत कर भारत का नाम गौरवान्वित किया है. वे हिमालय मोटरस्पोर्ट्स एसोसिएशन और भारतीय मोटरस्पोर्ट्स क्लब के महासंघ के साथ जुड़ी हुई है. दीपा ने 8 दिनों में 1700 किलोमीटर यात्रा जीरो तापमान में की, जिसमें वे 18000 फीट ऊंचाई पर भी चढ़ी थी, जहाँ ओक्सीजन तक की कमी थी. इस यात्रा हिमालय, लेह, शिमला और जम्मू सहित कई कठिन रास्तों से होकर पूरी हुई थी. यह ‘रेड दे हिमालय’ मोतोस्पोर्ट्स था. दीपा एक साधारण इन्सान नहीं है. दीपा को 30 साल की उम्र में कमर के नीचे लकवा का रोग हो गया. इस भयानक बीमारी ने भी दीपा के आत्मविश्वास को कम नहीं किया. एक सेना अधिकारी की पत्नी और दो बच्चों की माँ दीपा हर विपरीत परिस्थिति को अपने अनुसार अवसर एवं सफलता में बदलने की ताकत रखती है. इनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब सन 1999 में इन्हें रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर की शिकायत हो गई. ये वही समय था जब देश में कारगिल युद्ध का खतरा मंडरा रहा था. दीपा के पति विक्रम भी इस युद्ध में देश के लिए लड़ाई लड़ रहे थे. ये समय दीपा के परिवार के लिए बहुत मुश्किल भरा था, जहाँ एक ओर दीपा के पति विक्रम कारगिल युद्ध लड़ रहे थे, वही दूसरी ओर दीपा घर में अपनी ट्यूमर की बीमारी से लड़ाई कर रही थी. लेकिन अंत में दीपा के परिवार ने दोनों लड़ाइयाँ जीत लीं. भारत ने करिगिल का युद्ध जीत लिया और दीपा की तीन स्पाइनल ट्यूमर सर्जरी सफल रहीं. इस सर्जरी में दीपा के कंधो में 183 टाँके लगे. दीपा इस सबके बीच एक विजेता बनके सामने आई और उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़ के नहीं देखा.वे रोमांच के खेल में बहुत सक्रिय है. वे हिमालय मोटरस्पोर्ट्स एसोसिएशन के साथ जुड़ी हुई है, जिसके द्वारा वे सभी सक्षम और विकलांगों के लिए प्रेरणा का काम करती है. दीपा ने बहुत से साहसिक खेलों में हिस्सा लिया है. इन्होने यमुना नदी में कठिन स्थल में बेहतरीन तैराकी कर सबको अचम्भे में डाल दिया. ये एक स्पेशल बाइक चालक है, साथ ही इन्होने पैरालिम्पिक गेम्स में शॉट पॉट गेम में हिस्सा लेकर सबको ये बता दिया कि जहाँ चाह है वहां राह है.
ये कहानिया उदाहरण हैं एक नारी के जज़्बे, आत्मविश्वास और हिम्मत का जो ये साबित करती हैं की नारी ईश्वर की बनायीं सर्वश्रेष्ठ रचना है।
आप सभी को विश्व दिव्यांग दिवस की बधाई और अपनी दिव्यांगता को अपनी कमज़ोरी न समझे। अपनी हिम्मत की आग हमेशा जलाये रखिये और पूरे मन से कहिये अलग होना गलत होना कतई नहीं स्वाभिमान से आगे बढिये।

Written by: Noopur Chauhan, Kanpur, UP. Jr. Editor, Ability India

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