जज़्बा – आत्मविश्वास,हिम्मत और स्त्रीत्व की.. भाग – २

जज़्बा – आत्मविश्वास,हिम्मत और स्त्रीत्व की.. भाग – २

अरुणिमा सिन्हा- अरूणिमा सिन्हा भारत से राष्ट्रीय स्तर की पूर्व वालीबाल खिलाड़ी तथा एवरेस्ट शिखर पर चढ़ने वाली पहली भारतीय दिव्यांग हैं जिन्होंने ये साबित कर दिया कि शरीर की कमी होने से कुछ नही होता आप दिमाग से कमी नही होने चाहिए। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरित हो यदि आप मानसिक रूप से मजबूत हैं तो पहाड़ो को चीरकर भी अपना रास्ता बना सकते हैं। अरुणिमा एक कायस्थ परिवार से हैं वह उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर की निवासी हैं और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सी आई एस एफ) में हेड कांस्टेबल के पद पर 2012 से कार्यरत हैं।वे एक राष्ट्रीय वालीबाल खिलाडी रह चुकी हैं और इसी दौरान 11 अप्रैल 2011 को अरुणिमा जी सी आई एस एफ का पेपर देने के लिए लखनऊ से दिल्ली जा रही थी। वे पदमावती एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे में सफर कर रही थी की बरेली के पास कुछ लुटेरों ने उनकी सोने की चैन और पर्स को खीचने और छिनने का प्रयास किया और जब अपराधी सफल नही हुए तो उन्होंने अरुणिमा जी को चलती ट्रैन से बाहर फेक दिया।ट्रैन से बाहर फेकने के कारण उनके कमर और पेट में गहरी चोट आई। वे उठने की हालत में नही थी| पास वाले ट्रैक पर एक ट्रेन उनकी तरफ आ रही थी उन्होंने ट्रैक से हटने की हर सम्भव कोशिश की परन्तु तब तक ट्रेन उनके बाएँ पैर के ऊपर से निकल चुकी थी और उनका बायाँ पैर घुटने के नीचे तक पूरी तरह से कट चुका था और दाएं पैर में से हड्डियाँ बाहर निकल आई थी जिसके बाद वे बेहोश हो गई।वे पूरी रात उसी हालत में रेलवे ट्रैक पर पड़ी रही अगले दिन जब सुबह हुई तो गाँव वाले उनको बरेली के अस्पताल में लेकर गए । वहां के डॉक्टरो ने उनकी हालत देखी और कहा की इनका पैर काटना पड़ेगा ताकि ये जीवित रह सकें परन्तु हमारे पास खून और एनेस्थेसिया नही है।अरुणिमा जी को दिखाई तो कुछ नही दे रहा था परन्तु उनको सुनाई जरुर दे रहा था और इसके बाद उन्होंने बिना एनेस्थेसिया के ही ऑपरेशन करने के लिए डॉक्टर्स से कहा अरुणिमा जी की हिम्मत को देखकर वहां को दो डॉक्टरो ने अपना एक -एक यूनिट खून दिया और बिना एनेस्थेसिया के उनका पैर काट दिया। जब मीडिया के लोगो को और सरकार को ये पता चला की दुर्घटना की शिकार महिला एक राष्ट्रीय स्तर की वालीबाल खिलाडी है तो उनको बरेली से लखनऊ के हॉस्पिटल में शिफ्ट किया गया और बाद में 18 अप्रैल 2011 को उनको ऐम्स में भर्ती करवाया गया जहाँ चार महीनों तक अरुणिमा जी का इलाज चला। पैर कटने की वजह से उनको कृत्रिम पैर लगाया गया तथा दूसरे पैर में रॉड डाली गई में चल रहे इलाज के दौरान उन्होंने फिर से मिले इस जीवन में कुछ कर गुजरने का फैसला लिया। दिल और दिमाग को झकझोर देने वाली इस घटना के बाद भी उनके जीवन में निराशा नाम की कोई चीज नही थी।उन्होंने फैसला किया की वे अब वालीबाल नही सबसे कठिन खेल खेलेंगी और उन्होंने पर्वतारोहण को चुना। उन्होंने अपना लक्ष्य दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवेरेस्ट पर तिरंगा फहराने को बनाया। इसके लिए उन्होंने उत्तरकाशी में स्थित नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटेनियरिंग से पर्वतारोही का कोर्स किया और साथ ही भारत की पहली महिला पर्वतारोही बछेंद्री पाल से भी मदद मांगी कठिन संघर्ष और मुसीबतों के बावजूद आख़िरकार 21 मई 2013 को उन्होंने एवरेस्ट को फतह कर लिया और ऐसा करके अरुणिमा सिन्हा जी विश्व की पहली दिव्यांग महिला पर्वतारोही बन गई। माउंट एवरेस्ट को फतह करने का ये सफर 52 दिन तक चला था।

Written by: Noopur Chauhan, Kanpur, Jr. Editor, Ability India

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Font Resize